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छप्पनिया अकाल: जब लोगों को कुत्तों से खाना छीनकर पेट भरना पड़ा

BBC News HindiBy BBC News Hindi
2 Nov 2026
Original: English
छप्पनिया अकाल: जब लोगों को कुत्तों से खाना छीनकर पेट भरना पड़ा
छप्पनिया अकाल: जब लोगों को कुत्तों से खाना छीनकर पेट भरना पड़ा
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AI Synopsis & Key Briefing

1899-1900 के इस अकाल में घास-चारे के बिना पशु एक-एक कर मरते चले गए थे और इंसान हड्डियों के ढांचे में बदल गए थे.

Key Highlights & Official Takeaways
  • ✓1899-1900 के इस अकाल में घास-चारे के बिना पशु एक-एक कर मरते चले गए थे और इंसान हड्डियों के ढांचे में बदल गए थे.
  • ✓नोट: इस रिपोर्ट में दिए कुछ विवरण आपको परेशान कर सकते हैं.
  • ✓"कालू की ओर बहने वाली हवा और उस मौसम की मार मानो चिल्ला रही थी- खाओ!
  • ✓खाओ!" "पक्षी भी भूख और प्यास से तड़प रहे थे.
Comprehensive News & Policy Report

नोट: इस रिपोर्ट में दिए कुछ विवरण आपको परेशान कर सकते हैं. "कालू की ओर बहने वाली हवा और उस मौसम की मार मानो चिल्ला रही थी- खाओ! खाओ!" "पक्षी भी भूख और प्यास से तड़प रहे थे. चैत्र की हवाएँ और लू बिल्कुल सूखी और झुलसाने वाली थीं.

चारों तरफ़ जली-पड़ी धरती ऐसी लगती थी, जैसे कालु को अपना दुश्मन मानकर उसके पैरों को जकड़ लेना चाहती हो." घास के गठ्ठों और गहनों के सहारे किसी तरह दो महीने निकालने के बाद उसने पूछा, "क्या पूरे बारह महीने से रूठी हुई बारिश जेठ के आख़िरी पखवाड़े में भी नहीं लौटेगी?" "मानो जेठ का आख़िरी पखवाड़ा सामने खड़ा हो.

कालु तुरंत बोल पड़ा, "एक बार बरसात आ जाए, फिर किसी तरह दिन कट ही जाएँगे. पेड़ों की कोंपलें और साग-पात खाकर भी गुज़ारा कर लेंगे. बस किसी तरह बारिश हो जाए." "तभी गाँव की ढलान वाली पगडंडी के दूसरे छोर से एक चीख़ सुनाई दी, 'दौड़ो.

मवेशियों पर हमला हो गया है. दौड़ो.'" "कालू के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई. और ऊपर चढ़कर उसने जो नज़ारा देखा, उसे कालू सात जन्मों में भी नहीं भूल सकता था..." "मरे हुए मवेशियों पर बीस कंकाल जैसे लोग टूट पड़े थे. उनके दांत चाकू की तरह दिख रहे थे.

भूख ने उनके पेट में जैसे आग लगा रखी थी." कालू सिहर उठा. एक पल के लिए उसे लगा, कहीं ये गिद्ध तो नहीं? वे गिद्धों की तरह ही टूट पड़े थे. दो-तीन लोग मवेशी के हर पैर को पकड़े हुए थे, जबकि ऊपर चढ़े दो आदमी तलवारों से उन्हें काट रहे थे.

अगर उनके शरीर पर लंगोटी के अलावा कोई कपड़ा होता, तो वे उसे भी फाड़ देते. वे उनकी बगलों पर वार कर रहे थे. पेट और जांघों के बीच दबा रहे थे. तलवार के डर के बावजूद, कुछ लोग शायद एक-एक तीर निकाल लेते. "कालुक बड़ी मुश्किल से उठा.

उसका पूरा शरीर अकड़ गया था. वह रोते-रोते सो गया था. आँखें खुलीं तो उनमें फिर आँसू भर आए. वह उठकर बोला, "हे भगवान, तुम्हारा नामोनिशान मिट जाए. मेरे लोगों की यह कैसी दशा हो गई है." वह भारी साँसें लेते हुए बड़बड़ाया, मानो कोई पहाड़ तोड़ रहा हो, 'दुनिया में बुराई से भी बदतर कोई चीज है तो वह है भूख!'" देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां.

गुजराती साहित्य के जाने-माने लेखक और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित पन्नालाल पटेल ने अपने उपन्यास 'मानवीनी भवाई' में छप्पनिया अकाल की पृष्ठभूमि में भूख और इंसानी बेबसी की इस भयावह तस्वीर को बयां किया है. इस उपन्यास में कालू नाम के काल्पनिक किरदार के ज़रिए लेखक ने प्राकृतिक आपदा, भूख, इंसानी संघर्ष और आत्मसम्मान के लिए किए गए भीषण संघर्ष को दर्शाते हैं.

यह उपन्यास प्रेम, भूख और मानवीय संवेदनाओं का ऐसा दस्तावेज़ है, जो अकाल की भयावहता के बीच भी मनुष्य की जीने की इच्छा और उसके दृढ़ संकल्प को जीवित रखता है.

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Topic CategoryINDIA
JurisdictionAll India / National
Publication Date2 November 2026
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