'पायर': बुज़ुर्ग दंपती के प्यार, तन्हाई और इंतज़ार की कहानी जिसने दर्शकों को कर दिया भावुक

111 मिनट की फिल्म 'पायर' पलायन के गंभीर मुद्दे को भी दिखाती है. पलायन की वजह से हिमालयन रेंज के सैकड़ों ख़ूबसूरत गांव खाली हो गए हैं और भूतिया गांवों में बदल गए हैं.
- ✓111 मिनट की फिल्म 'पायर' पलायन के गंभीर मुद्दे को भी दिखाती है.
- ✓पूरे देश में समीक्षकों और दर्शकों का दिल जीत रही फ़िल्म पायर (Pyre) एक बुज़ुर्ग दंपती के प्रेम और उनकी ख़ामोश तन्हाई की कहानी है.
- ✓फ़िल्म को तैयार होने के बाद सिनेमाघरों तक पहुंचने में दो साल लग गए.
- ✓111 मिनट की इस फ़िल्म का निर्देशन टीवी पत्रकार से फ़िल्मकार बने विनोद कापड़ी ने किया है.
पूरे देश में समीक्षकों और दर्शकों का दिल जीत रही फ़िल्म पायर (Pyre) एक बुज़ुर्ग दंपती के प्रेम और उनकी ख़ामोश तन्हाई की कहानी है. फ़िल्म को तैयार होने के बाद सिनेमाघरों तक पहुंचने में दो साल लग गए. 111 मिनट की इस फ़िल्म का निर्देशन टीवी पत्रकार से फ़िल्मकार बने विनोद कापड़ी ने किया है.
यह फ़िल्म पलायन के गंभीर मुद्दे को भी दिखाती है. पलायन की वजह से हिमालयन रेंज के सैकड़ों ख़ूबसूरत गांव खाली हो गए हैं और भूतिया गांवों में बदल गए हैं. फ़िल्म जलवायु परिवर्तन के असर को भी दिखाती है, जिसने इस क्षेत्र के मौसम को पहले से ज़्यादा कठिन बना दिया है.
सोशल मीडिया पर कई भारतीयों ने ऐसे वीडियो साझा किए हैं, जिनमें दर्शक सिनेमाघरों से आंखों में आंसू लेकर बाहर निकलते दिख रहे हैं. कुछ लोगों ने लिखा कि किसी फ़िल्म ने उन्हें बहुत समय बाद इतना भावुक किया है. फ़िल्म के मुख्य कलाकारों की भी काफ़ी तारीफ़ हुई है.
ये साधारण ग्रामीण हैं, जिन्होंने पहले कभी कैमरे का सामना नहीं किया था. बॉलीवुड के सम्मानित कलाकार नसीरुद्दीन शाह और अनुपम खेर ने भी उनकी सराहना की है. पायर के मुख्य पात्र पदम सिंह ने पदम का किरदार निभाया है. और तुलसी ने हीरा देवी का किरदार निभाया है.
उन्हें स्थानीय भाषा में बुबू और आमा कहा जाता है, जिसका मतलब दादा और दादी होता है. यह दंपती उत्तराखंड राज्य के पहाड़ों में बने एक छोटे से घर में रहता है. यह ऐसी जगह है जहां उम्र का हिसाब बड़ी ऐतिहासिक घटनाओं से लगाया जाता है.
पदम सिंह का जन्म द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने से दो साल पहले हुआ था. तुलसी का जन्म उस साल हुआ था, जब जापान पर परमाणु बम गिराए गए थे. उनके गांव में न सड़क है और न ही बिजली. जब भी इस दंपती को मदद की ज़रूरत पड़ती है, जो अक्सर पड़ती है क्योंकि तुलसी को कई बार अस्पताल ले जाना पड़ता है, तब पदम सिंह एक पारंपरिक लंबे सींग वाले वाद्य यंत्र को बजाकर पड़ोसियों को बुलाते हैं.
पड़ोसी उनकी मदद करते हैं. बदले में पदम सिंह उन्हें बकरियां देकर उनका आभार जताते हैं. आपके लिए नितिन श्रीवास्तव द्वारा चुनी गईं खास कहानियाँ "यहां कुछ नहीं है. सिर्फ पहाड़ हैं." ये डायलॉग फ़िल्म में मुख्य किरदार निभा रहे पदम सिंह कहते हैं.
"इसलिए युवा बेहतर रोज़गार और बेहतर ज़िंदगी की तलाश में गांव छोड़ देते हैं. जो लोग इस ख़ूबसूरत लेकिन मुश्किलों से घिरी ज़मीन को छोड़ते हैं, वे बहुत कम ही वापस लौटते हैं." फ़िल्मकार विनोद कापड़ी कहते हैं कि उनकी फ़िल्म का केंद्र जीवन के आख़िरी दिनों में जी रहे बुज़ुर्ग दंपती की प्रेम कहानी है.
कापड़ी ने बीबीसी से कहा, "उन्होंने 65 साल साथ बिताए हैं. पिछले 28 साल से वे अपने बेटे हरिया का इंतज़ार कर रहे हैं. हरिया काम की तलाश में मुंबई गया था. वे उसके लौटने का इंतज़ार कर रहे हैं. यह साथ निभाने, तन्हाई और इंतज़ार की कहानी है." फ़िल्म में दोनों का इंतज़ार अचानक और ज़्यादा अहम हो जाता है.
इतने सालों बाद हरिया का एक ख़त आता है. उसमें वह अपने घर आने की तारीख़ बताता है. पदम सिंह और तुलसी दिन गिनने लगते हैं. इस बीच उनके आसपास रहने वाले कुछ गांववाले एक-एक करके गांव छोड़ देते हैं. आख़िर में यह दंपती विशाल पहाड़ी इलाक़े में बिल्कुल अकेला रह जाता है.
गांव छोड़कर जा रहा एक व्यक्ति पदम सिंह से कहता है, "तुम और तुलसी भी जितनी जल्दी हो सके यहां से चले जाओ. नहीं तो जब तुम या तुलसी की मौत होगी, तब तुम्हारे शव को पहाड़ से नीचे श्मशान की चिता तक ले जाने के लिए चार लोग भी नहीं मिलेंगे."
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| Issuing Authority | BBC News Hindi |
|---|---|
| Topic Category | ENTERTAINMENT |
| Jurisdiction | All India / National |
| Publication Date | 8 November 2026 |