यूएनसीसीडी सीओपी17 में भारत का आह्वान, चरागाहों का सामुदायिक नेतृत्व में हो पुनर्स्थापन
यूएनसीसीडी सीओपी17 में भारत का आह्वान, चरागाहों का सामुदायिक नेतृत्व में हो पुनर्स्थापन
- ✓यूएनसीसीडी सीओपी17 में भारत का आह्वान, चरागाहों का सामुदायिक नेतृत्व में हो पुनर्स्थापन
- ✓उन्होंने विज्ञान, सुरक्षित अधिकारों और सामुदायिक देखरेख पर आधारित पुनर्स्थापन मॉडल अपनाने की जरूरत पर जोर दिया।
- ✓उन्होंने वैज्ञानिक योजना और सामुदायिक भागीदारी के मेल से घास के मैदानों और चरागाहों को पुनर्स्थापित करने के भारत के अनुभव साझा किए।
- ✓उन्होंने कहा कि पशुपालकों की भागीदारी को केवल लाभार्थी तक सीमित रखने के बजाय उन्हें प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षक बनाया जाना चाहिए।
26/08/26 | 4:57 pm | Bhupeन्द्र Yadav | grassland restoration | land degradation neutrality | pastoral communities | South-South Cooperation | sustainable grazing | UNCCD COP17
भारत ने मंगोलिया की राजधानी उलानबटार में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण निवारण कन्वेंशन (यूएनसीसीडी) के 17वें पक्षकारों के सम्मेलन (सीओपी17) में चरागाहों के सामुदायिक-नेतृत्व वाले पुनर्स्थापन का आह्वान किया। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि सफल पुनर्स्थापन की शुरुआत पशुपालकों को महज लाभार्थी नहीं, बल्कि संरक्षक मानने से होती है। उन्होंने विज्ञान, सुरक्षित अधिकारों और सामुदायिक देखरेख पर आधारित पुनर्स्थापन मॉडल अपनाने की जरूरत पर जोर दिया।
मंत्री-स्तरीय संवाद में ‘चरागाहों का पुनर्स्थापन और पशुपालक समुदायों का कल्याण’ विषय पर संबोधित करते हुए भूपेंद्र यादव ने कहा कि चरागाह पशुपालक समुदायों की आजीविका, जैव-विविधता संरक्षण तथा जल और कार्बन चक्रों के नियमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने वैज्ञानिक योजना और सामुदायिक भागीदारी के मेल से घास के मैदानों और चरागाहों को पुनर्स्थापित करने के भारत के अनुभव साझा किए।
भूपेंद्र यादव ने कहा कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान को साथ लाकर ऐसी पुनर्स्थापन व्यवस्था विकसित की जा सकती है, जो पारिस्थितिकी की दृष्टि से उपयुक्त, आर्थिक रूप से व्यावहारिक और सामाजिक रूप से समावेशी हो। उन्होंने कहा कि पशुपालकों की भागीदारी को केवल लाभार्थी तक सीमित रखने के बजाय उन्हें प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षक बनाया जाना चाहिए।
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि भारत के चरागाह विभिन्न प्रकार के भूदृश्यों में फैले हुए हैं। इनमें हिमालय के चरागाहों और मध्य भारत के सवाना से लेकर सूखे थार और कच्छ के इलाकों तथा दक्षिण भारत के शोला वनों तक के क्षेत्र शामिल हैं। ये क्षेत्र देश की बड़ी पशु और मानव आबादी की आजीविका का आधार हैं।
यादव ने कहा कि उपग्रह आधारित मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण संबंधी एटलस घास के मैदानों की मैपिंग और उनके पुनर्स्थापन की योजना को वैज्ञानिक आधार प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि चराई के अधिकारों और सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों को मान्यता देने से प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की भूमिका और मजबूत होती है।
राजस्थान के ‘ओरान’ सामुदायिक संरक्षण का उदाहरण
भारत में सामुदायिक संरक्षण की पारंपरिक प्रणालियों का उदाहरण देते हुए भूपेंद्र यादव ने राजस्थान के ‘ओरान’ का उल्लेख किया। ये पवित्र उपवन हैं, जिन्हें स्थानीय समुदाय उनके सांस्कृतिक और पर्यावरणीय महत्व के कारण संरक्षित करते हैं। उन्होंने बताया कि देशभर में करीब 0.6 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में फैले लगभग 25,000 सामुदायिक रूप से संरक्षित पवित्र उपवन सामुदायिक देखरेख का उदाहरण हैं।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि ये पवित्र उपवन पशुपालकों के भूमि अधिकारों को सुरक्षित करने के साथ महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवासों के संरक्षण में भी मदद करते हैं। इनमें ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के आवास भी शामिल हैं। उन्होंने बताया कि कई पवित्र उपवन कानूनी प्रावधानों के तहत संरक्षित हैं।
यादव ने खुले जंगल और घास के मैदान वाले इकोसिस्टम को पुनर्स्थापित करने के भारत के प्रयासों का भी उल्लेख किया। इनमें चीता को फिर से बसाने और गुजरात के बन्नी जैसे घास के मैदानों में उनके विस्तार की योजना शामिल है। उन्होंने कहा कि गहरी जड़ों वाली घास मिट्टी में कार्बन जमा करने, पानी के जमीन में जाने की क्षमता बढ़ाने और भूजल पुनर्भरण में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
10 मिलियन हेक्टेयर चरागाहों के संरक्षण पर जोर
केंद्रीय मंत्री के अनुसार, भारत में करीब 10 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में स्थायी चरागाह और पशुओं के चरने वाली भूमि है। इन क्षेत्रों में घास के मैदानों की गहरी जड़ें मिट्टी में कार्बन भंडारण और जल संरक्षण के साथ भूजल पुनर्भरण में भी मदद करती हैं।
लैंडस्केप मैनेजमेंट से आजीविका तक एकीकृत मॉडल
भूपेंद्र यादव ने कहा कि भारत का दृष्टिकोण लैंडस्केप मैनेजमेंट, वॉटरशेड डेवलपमेंट, सतत चराई, चारा विकास और आजीविका संबंधी सहायता को एकीकृत करता है। इस पूरी प्रक्रिया में समुदाय की भागीदारी को केंद्रीय भूमिका दी जाती है।
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| जारीकर्ता प्राधिकरण | DD News National |
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| विषय श्रेणी | INDIA |
| क्षेत्र / अधिकार क्षेत्र | अखिल भारतीय (राष्ट्रीय) |
| सार्वजनिक तिथि | 26 अगस्त 2026 |