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National News Desk
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दिल्ली का प्रदूषण रोज 30 सिगरेट पीने जैसा, बोल जाएगा आपका फेफड़ा

Aaj Tak National HindiBy Aaj Tak National Hindi
6 Nov 2026
Original: English
AI Synopsis & Key Briefing

Severe AQI में सांस लेना सेहत के लिए गंभीर खतरा है. PM2.5 के ज्यादा संपर्क में आने की तुलना वैज्ञानिक एक दिन 30 सिगरेट पीने से करते हैं. इससे फेफड़ों, हृदय और आवाज के अंगों पर बुरा असर पड़ता है.

Key Highlights & Official Takeaways
  • ✓Severe AQI में सांस लेना सेहत के लिए गंभीर खतरा है.
  • ✓दिल्ली-NCR समेत उत्तर भारत के कई इलाकों में वायु प्रदूषण एक बार फिर गंभीर स्वास्थ्य संकट बनता जा रहा है.
  • ✓हवा में मौजूद जहरीले कणों के कारण लोगों को सांस लेने में परेशानी, लगातार खांसी, गले में खराश और आवाज बैठने जैसी समस्याएं हो रही हैं.
  • ✓प्रदूषण की गंभीरता समझाने के लिए अक्सर कहा जाता है कि जहरीली हवा में सांस लेना एक दिन में 30 सिगरेट पीने के बराबर है.
Comprehensive News & Policy Report

दिल्ली-NCR समेत उत्तर भारत के कई इलाकों में वायु प्रदूषण एक बार फिर गंभीर स्वास्थ्य संकट बनता जा रहा है. हवा में मौजूद जहरीले कणों के कारण लोगों को सांस लेने में परेशानी, लगातार खांसी, गले में खराश और आवाज बैठने जैसी समस्याएं हो रही हैं.

प्रदूषण की गंभीरता समझाने के लिए अक्सर कहा जाता है कि जहरीली हवा में सांस लेना एक दिन में 30 सिगरेट पीने के बराबर है. यह तुलना डराने वाली जरूर है, लेकिन इसके पीछे वैज्ञानिक आधार भी है. इसका मतलब यह नहीं है कि प्रदूषित हवा और तंबाकू के धुएं का रासायनिक प्रभाव बिल्कुल एक जैसा है.

दिल्ली में 5 नवंबर को 24 घंटे का औसत AQI 369 दर्ज किया गया, जो Very Poor श्रेणी में था. वहीं कई निगरानी केंद्रों पर AQI 400 के पार पहुंच गया. 22 केंद्रों पर रात के समय हवा Severe श्रेणी में दर्ज की गई. ऐसे हालात में स्वस्थ व्यक्ति भी प्रदूषण के असर से अछूता नहीं रह सकता.

आखिर प्रदूषण की तुलना 30 सिगरेट से क्यों की जाती है? इस तुलना का आधार PM2.5 नामक प्रदूषक है. PM2.5 ऐसे बेहद छोटे कण होते हैं जिनका आकार 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है. ये इतने छोटे होते हैं कि नाक और गले की प्राकृतिक सुरक्षा व्यवस्था को पार करके फेफड़ों के भीतर गहराई तक पहुंच सकते हैं.

कुछ कण फेफड़ों की खून की नसों तक पहुंचकर शरीर में सूजन और दूसरी बायोलॉजिकल रिएक्शन पैदा कर सकते हैं. यह भी पढ़ें: अल-नीनो से बिगड़ा मॉनसून, अब घटेगी पेट्रोल में इथेनॉल की ब्लेंडिंग... जानिए क्या कहते हैं आंकड़ें Berkeley Earth के वैज्ञानिकों ने PM2.5 के संपर्क और सिगरेट पीने के स्वास्थ्य जोखिमों की एक तुलना की थी.

इस गणना के मुताबिक, 24 घंटे तक 22 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर PM2.5 के संपर्क को लगभग एक सिगरेट प्रतिदिन के बराबर बताया गया. इसी आधार पर अगर PM2.5 का स्तर 660 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हो तो यह तुलना करीब 30 सिगरेट प्रतिदिन तक पहुंच जाती है.

भारत में AQI 401 से 500 के बीच होने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति अनिवार्य रूप से 30 सिगरेट के बराबर प्रदूषण सांस के जरिए ले रहा है. भारत में Severe श्रेणी PM2.5 के 250 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर या उससे अधिक होने पर भी बन सकती है.

AQI आठ प्रदूषण वाले तत्वों के आधार पर तय होता है. सबसे खराब प्रदूषक का सूचकांक अंतिम AQI निर्धारित कर सकता है. इसलिए सिगरेट वाली तुलना के लिए वास्तविक PM2.5 स्तर और संपर्क की अवधि जानना जरूरी है. महत्वपूर्ण बात: AQI और सिगरेट के बीच कोई सीधा या आधिकारिक रूपांतरण नहीं है.

ऊपर दी गई तुलना केवल PM2.5 की मात्रा और 24 घंटे के संपर्क पर आधारित एक मोटा वैज्ञानिक अनुमान है. भारत का AQI कई प्रदूषकों के आधार पर तय होता है. इसलिए केवल AQI देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि कोई व्यक्ति कितनी सिगरेट पीने के बराबर प्रदूषण सांस के साथ ले रहा है.

प्रदूषित हवा में मौजूद PM2.5 केवल धूल नहीं है. इसमें वाहन और उद्योगों का धुआं, कोयले और डीजल के जलने से निकले कण, पराली और कचरा जलाने से पैदा हुए प्रदूषक तथा रासायनिक रूप से बने सूक्ष्म कण शामिल हो सकते हैं. यह भी पढ़ें: 22 साल स्पेस में खोज करने वाला NASA का Swift टेलीस्कोप जमीन पर गिरा जब कोई व्यक्ति सांस लेता है तो ये कण श्वसन नली के रास्ते फेफड़ों तक पहुंचते हैं.

शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली इन्हें बाहरी खतरे के रूप में पहचानकर प्रतिक्रिया देती है. इससे फेफड़ों और सांस की नलियों में सूजन पैदा हो सकती है. नतीजतन खांसी, सीने में जकड़न, सांस फूलना और घरघराहट जैसी समस्याएं होती हैं. अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) के अनुसार, कण प्रदूषण से फेफड़ों की कार्यक्षमता घट सकती है, सांस की नलियों में सूजन बढ़ सकती है और अस्थमा तथा दूसरी श्वसन बीमारियां गंभीर हो सकती हैं.

लंबे समय तक संपर्क रहने पर फेफड़ों को स्थायी नुकसान पहुंचने का जोखिम भी बढ़ता है. आवाज बैठने या गायब होने की समस्या को चिकित्सा विज्ञान में Hoarseness या Dysphonia कहा जाता है. हमारी आवाज वाले अंग (Larynx) में मौजूद दो वोकल कॉर्ड यानी स्वर तंत्रियों के कंपन से पैदा होती है.

जब हम बोलते हैं तो फेफड़ों से निकलने वाली हवा इन तंत्रियों को कंपन करने में मदद करती है. प्रदूषण में मौजूद सूक्ष्म कण और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, ओजोन तथा सल्फर डाइऑक्साइड जैसी गैसें गले और स्वरयंत्र की संवेदनशील सतह को परेशान कर सकती हैं.

इससे वहां जलन, सूखापन और सूजन हो सकती है. स्वर तंत्रियों में सूजन आने पर उनका सामान्य कंपन प्रभावित होता है. आवाज भारी, कर्कश या कमजोर हो सकती है. कई बार व्यक्ति को बोलने में दर्द और लगातार गला साफ करने की जरूरत महसूस होती है.

इसलिए प्रदूषण के दिनों में लगातार आवाज बैठना केवल सामान्य सर्दी-जुकाम का संकेत नहीं है. हर मामले में इसकी वजह प्रदूषण ही हो, यह जरूरी नहीं. वायरल संक्रमण, एलर्जी, एसिड रिफ्लक्स और धूम्रपान भी इसके कारण हो सकते हैं. प्रदूषण और सिगरेट के धुएं में क्या समानता है?

सिगरेट और प्रदूषित हवा दोनों में PM2.5 जैसे सूक्ष्म कण हो सकते हैं. दोनों शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन की प्रक्रिया को बढ़ा सकते हैं. ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस वह स्थिति है जिसमें शरीर में हानिकारक फ्री रेडिकल्स और उन्हें नियंत्रित करने वाले एंटीऑक्सिडेंट के बीच संतुलन बिगड़ जाता है.

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Topic CategoryPOLITICS
JurisdictionAll India / National
Publication Date6 November 2026
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